बसंत की
खुमारी के साथ
ही फागुन के
महीने में पूरा
माहौल रंगीन
हो जाता है।
फाल्गुन पूर्णिमा
के दिन रंगों
की बौछार होती
है। हर जगह होता
है उत्साह।
रंगों की खुमारी
में होता है
मस्ती भरा धमाल।
यह जाति-भेद,
ऊंच-नीच,अमीरी-
गरीबी से ऊपर
उठकर मित्रता
और भाईचारे
का त्योहार
है। इस दिन तो
दुश्मनों को
भी गले लगाने
में हिचक नहीं
होती। गले मिलकर
सब भूल जाते
हैं गिले शिकवे।
बच्चे हों या
बूढे। उम्र
का अंतर भी खत्म
हो जाता है।
कहने का मतलब
यह है कि गम को
भूल कर खुशियों
में इजाफा करने,
प्यार देने
और प्यार लेने
के दिन का नाम
है होलिकोत्सव
या होली। |